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Thursday, March 3, 2011

पत्रकार आवास योजना को तुरन्त प्रभाव से लागू करने की मांग


नगरपालिका स्तर पर पत्रकारों को भूखण्ड आवंटित करने की मांग
हनुमानगढ। राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ जिला इकाई ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, सूचना एवं  जनसम्पर्क  मंत्री अशोक बैरवा एवं निदेशक, सूचना एवं  जनसम्पर्क  निदेशालय को पत्र लिखकर राज्य सरकार द्वारा की गई घोषणाओं की क्रियान्विति की मांग की है। जिलाध्यक्ष अनिल जांदू ने बताया कि राज्य सरकार द्वारा बजट भाषण में राज्य में जिलास्तर पर पत्रकार आवास योजना शुरू करने की बात कही थी। इस योजना में पत्रकारों को आरक्षित दर की पच्चास प्रतिशत पर भूखण्ड आवंटित किए जाने थे। योजना के प्रथम चरण में पिंकसिटी प्रेस इन्क्लेव के तहत जयपुर में भूखण्ड आवंटित कर दिए गए हैं जबकि जिला मुख्यालयों व नगर परिषद् / पालिका स्तर पर योजना अभी तक लागू नहीं हो पाई है। इसके अलावा राज्य के समाचार पत्रों की विज्ञापन दर बढाने की घोषणा की गई थी, वहीं सभी छोटे समाचार पत्रों को वर्ष में कम से कम बारह सौ सेमी. के विज्ञापन जारी करने की घोषणा की गई थी, जो अभी तक पूर्ण रूप से क्रियान्वित नहीं की गई है। पत्रकार संघ ने पत्रकार हितों को लेकर की गई इन घोषणाओं को तुरन्त प्रभाव से लागू करने की मांग की है। जांदू ने बताया कि गत 31 दिसम्बर को भादरा मे आयोजित अखिल भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार समिति के अधिवेशन में आए सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय के पूर्व निदेशक डॉ. अमर सिंह राठौड से भी नगरपालिका स्तर पर पत्रकारों को भूखण्ड आवंटित करने की मांग की गई थी।

पत्रकारों को विश्वासघात करना सिखा रही है सरकार

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राजस्थान पत्रिका के मालिक गुलाब कोठारी
राजस्थान पत्रिका के मालिक गुलाब कोठारी
गुलाब कोठारी गुस्से में हैं. राजस्थान पत्रिका अखबार के मालिक गुलाब कोठारी को यह गुस्सा मजीठिया आयोग की उस सिफारिश पर आया है जिसमें संस्तुति की गयी है कि पत्रकारों के वेतन में वृद्धि होनी चाहिए. गुलाब कोठारी को शिकायत है कि सरकार पत्रकारों का वेतन बढ़ाकर उनका मन बढ़ा रही है और एक तरह से पत्रकारों को मालिकों के खिलाफ भड़का रही है. यह न केवल भ्रष्टाचार है बल्कि इससे सरकार की धृष्टता भी प्रकट होती है. बुधवार 2 मार्च 2011 को पत्रिका के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित गुलाब कोठारी का यह विशेष संपादकीय आपके विचार के लिए-
सत्ता के व्यभिचार का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष उदाहरण है-पत्रकारों के लिए गठित किया जाने वाला वेतन आयोग। देश में किसी भी अन्य क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए कोई आयोग गठित नहीं किया जाता। दूसरी बात आयोग मूलत: पत्रकार संगठनों के जरिए सरकारी भाषा बोलता है। तीसरी बात जो कुछ मीडिया में हो रहा है, उसके व्यवहार पक्ष एवं बदलते परिवेश की परवाह कोई नहीं करता और चौथी बात- कोई भी सरकार इसको लागू करने का प्रयास भी नहीं करती। जब देश के 15-20 संस्थानों के सिवाय इसे कोई लागू करता ही नहीं है। तब क्या सार्थकता है आयोग के गठन की?
सरकार पत्रकारों को दत्तक पुत्र मानती है और अपनी कमाई का अंश भी उन तक पहुंचाने को कृत संकल्प है। बिना संविधान की स्वीकृति के मीडिया को चौथा पाया मान लिया। पत्रकारों को दिल खोलकर सुविधाएं देकर संस्थान के प्रति विश्वासघात करना सिखाया जाता है। पत्रकारिता के सिद्धान्तों के स्थान पर सरकार की स्वार्थपूर्ति का प्रशिक्षण दिया जाता है। वेतन भी आयोगों के माध्यम से दोगुना, उससे अघिक सरकारी जमीनें-मकान-यात्रा सुविधाएं-मौज मस्ती और व्यवहार सरकारी नीतियों के अनुकूल। किसी भी संस्थान के कर्मचारियों को भ्रष्ट करना, संस्थान के हितों के विरूद्ध कार्य करने के लिए रिश्वत देना क्या न्याय संगत है? हाल ही में आपने देखा कैसे पत्रकारों को स्मार्ट काड्र्स के जरिए नकद राशि बांटी गई। और न किसी को शर्म आई, न किसी की नाक कटी। पत्रकारों की हैसियत मांगने वालों जैसी बनकर रह गई। भले ही प्रेस क्लब के नाम से मांगते हों।

इन सबका प्रभाव दो धाराओं में बंट गया। जिन समाचार-पत्रों ने पत्रकारों पर पकड़ बनाने का प्रयास किया और स्वतंत्र लेखन की परम्परा को जारी रखने का प्रयास किया, वे किसी भी सरकार के साथ, विशेषकर अघिकारियों के साथ, मधुर सम्बन्ध नहीं बना पाए। सरकारों के विरोध में लिखते रहने से कोप भाजन भी बनना पड़ा। अनेक शत्रु भी पैदा हो गए। उनके साधारण कार्य भी करने को कोई तैयार नहीं होता।

इसके विपरीत जिन समाचार पत्रों ने इस नीति को स्वीकृति दे दी, उन पर सरकार की अनुकम्पा बढ़ गई। कुछ समाचार-पत्र मालिक भी मांगने वालों की लाइन में खड़े हो गए। किसी भी सरकार को इससे अच्छा रास्ता क्या मिल सकता है। किन्तु सरकार के इस प्रश्रय के कारण इनमें स्वच्छन्दता घर कर गई। ये समाचारों के बदले धन भी मांगने लगे और विज्ञापनों के लिए व्यापारियों और कमजोर अघिकारियों को धमकियां भी देने लगे। जनता से जुड़ने की इनकी आवश्यकता ही समाप्त हो गई। धन की बरसात में देश के अनेक बड़े-बड़े अखबार डूब गए। चस्का राज्यसभा में जाने और अन्य सरकारी पुरस्कार पाने का भी लग गया।

सरकारों ने अखबारों का, विज्ञापनों का भी राजनीतिकरण कर दिया। हर नेता ने अखबार खड़े कर लिए। आज 80 प्रतिशत से अघिक फर्जी अखबार सरकारी सूची में हैं। लोगों ने उनके नाम भी नहीं सुने। उनको करोड़ों रूपए के विज्ञापन हर साल जारी होते हैं। प्रसार संख्या भले सैकड़ों में हो बताते लाखों में हैं। उसी आधार पर मनमानी दरें लेते हैं। सरकारें कुछ देखती नहीं। दोनों, अखबार मालिक तथा सूचना और जनसम्पर्क निदेशालय तरबतर रहते हैं। इनके पत्रकारों को अघिस्वीकरण की सुविधाएं अलग मिल रही हैं। सरकारी मेहमान एवं रौब मारने वाले जनप्रतिनिघि की तरह व्यवहार करते हैं।

स्वयं सरकार इनको कानून के परे जाकर सिर पर बिठाती है। समाचार-पत्रों को निदेशालय द्वारा जारी विज्ञापनों पर स्वयं विभाग दलाली खाता है। यह दलाली सरकारी खजाने में नहीं जाती। अफसर खाते हैं। सरकारी दरों पर कमीशन का अवैधानिक कानून तक सरकार ने बना दिया है। कई प्रदेशों के उच्च न्यायालय इसके खिलाफ फैसला दे चुके हैं। हमारी सरकार इसकी परवाह नहीं करती। बल्कि इस सुख का फिर से लाभ उठाने के लिए सेवानिवृत्त अघिकारी को फिर से जिन्दा करके निदेशक पद पर बिठा दिया। कोई बात का उत्तर तो दे कि 'संवाद' संस्था बनाने का सरकार का औचित्य क्या है। सरकार धन बचाना चाहती है तो विज्ञापनों की दरें कम कर सकती है। वो भी नहीं। सरकारी संस्था की आय सरकारी खाते में क्यों नहीं जाती।

यह सारे उदाहरण इस बात के सूचक हैं कि सरकारें स्वतंत्र प्रेस चाहती ही नहीं हैं। पत्रकारों को चेतना शून्य बनाए रखना चाहती हैं। ताकि कोई पत्रकार अपने संस्थान के प्रति निष्ठावान नहीं रह पाए। पीछे के दरवाजे से उन्हें भ्रष्ट करने में लगी रहती हैं। और यह सारा प्रयास केवल प्रेस और पत्रकारिता को खरीदने के लिए। इससे ज्यादा व्यभिचार और हो भी क्या सकता है। संस्थान से आयोग के जरिए दोगुना वेतन दिलाना और हडि्डयां डालकर संस्थान के विरूद्ध कार्य करवाना।फिर भी आप इनको न भ्रष्ट कह सकते हैं, न ही धृष्ट!!

Friday, February 18, 2011

मीडिया में नारी शोषण .............

मीडिया में नारी शोषण .............
( तोशी गुप्ता / रायपुर ) 
नारी कुदरत क़ी बनाई अनिवार्य रचना है ,जिसके उत्थान हेतु समाज के बुद्धिजीवी वर्ग ने सतत संघर्ष किया है। आज क़ी बहुमुखी प्रतिभाशील नारी उसी सतत प्रयास का परिणाम है। आज नारी ने हर क्षेत्र में अपना प्रभुत्व कायम किया है, चाहे वह शासकीय क्षेत्र हो या सामाजिक, घर हो या कोर्ट कचहरी , डाक्टर, इंजिनीयर, अथवा सेना का क्षेत्र, जो क्षेत्र पहले सिर्फ पुरुषो के आधिपत्य माने जाते थे, उनमे स्त्रियों क़ी भागीदारी प्रशंसा का विषय है। इसी तरह प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया भी स्त्रीयों क़ी भागीदारी से अछूता नहीं है । प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया समाज के दर्पण होते है, जिसमे समाज अपना अक्श देखकर आत्मावलोकन कर सकता है । पिछले कई वर्षो से मीडिया में नारी क़ी भूमिका सोचनीय होती जा रही है। आज प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया जिस तरह नारी क़ी अस्मिता को भुना रहा है, वह जाने - अनजाने समाज को एक अंतहीन गर्त क़ी ओर धकेलते जा रहा है। इसका दुष्परिणाम यह है क़ी आज नारी ऊँचे से ऊँचे ओहदे या प्रोफेशन में कार्यरत क्यों ना हो वह सदैव एक अनजाने भय से ग्रसित रहती है। क्या है ये अनजाना भय ? निश्चित रूप से यह केवल उसके नारी होने का भय है जो हर समय उसे असुरक्षित होने का अहसास दिलाता रहता है। आलम यह है क़ी आज नारी घर क़ी चारदीवारी में भी अपनी अस्मिता बचने में अक्षम है। प्रारंभ में प्रिंट एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया धार्मिक, सात्विक संदेशो द्वारा समाज को सही मार्गदर्शन देने का आधार था , लेकिन धीरे - धीरे उसका भी व्यवसायीकरण हो गया और झूठी लोकप्रियता भुनाने वह समाज के पथप्रेरक के रूप में कम और पथभ्रमित करने के माध्यम के रूप में अधिक नज़र आने लगा। शुरुआत हम छोटे परदे से करते है, जहा लगभग हर सीरीयल मे मानवीय संबंधो के आदर्श रूप को नकारते हुए नारी को एक ऐसी " वस्तु " के रूप में दर्शको के सामने परोसा जाता है, जंहा वह केवल एक भोग्या मात्र ही दिखाई जाती है। हर दूसरा सीरीयल नारी के पूज्यनीय चरित्र क़ी धज्जिया उडाता हुआ नज़र आता है। एक नारी पात्र ही दूसरी नारी पात्र पर शोषण और अत्याचार करती हुई नज़र आती है। नारी के विकृत रूप को दिखाने क़ी रही सही कसर एक ख्याति प्राप्त निर्देशिका के डेली सोप सीरीयलों ने पूरी कर दी जिसने रिश्तो क़ी सभी मर्यादाए तोड़ दी और कितने आश्चर्य क़ी बात है कि यही सब सीरीयल काउंट डाउन शो में अपनी सफलता के परचम गाड़ते हुए टाप नम्बरों पर होते है। इसी तरह यदि हम विभिन्न विज्ञापनों कि बात करे तो विज्ञापनों ने तो हमारी संस्कृति कि सीमा ही लाँघ दी। विज्ञापनों में नारी कि भूमिका कंही से भी विकृत नहीं बशर्ते कि उससे समाज को अच्छा सन्देश मिले लेकिन विज्ञापनों में नारी के नग्न रूप का प्रदर्शन समाज में नारी के प्रति आकर्षण नहीं बल्कि विकर्षण पैदा करता है । अप्रत्यक्ष रूप से ऐसा विज्ञापन समाज में गन्दी मानसिकता पनपने पर जोर देता है ओर सामाजिक अपराधो को बल मिलता है। बलात्कार, महिला शोषण, यौन शोषण आदि सब इसी विकर्षण का नतीजा है। अधिकतर विज्ञापनों में नारी देह प्रदर्शन ही देखने को मिलता है। किसी ने तर्क के आधार पर यह जानने का प्रयास ही नहीं किया कि देह प्रदर्शन के कारन बाजार में कोई वस्तु बिकती है या अपनी गुणवत्ता के कारन। किसी वस्तु को विज्ञापनों में देह प्रदर्शन के बिना प्रदर्शित किया जाये तो उसकी बिक्री कम होगी या नहीं होगी ऐसा कोई तर्क स्वीकार्य नहीं है। कितने अफ़सोस कि बात है कि आज किसी वस्तु के प्रचार - प्रसार के लिए एक नारी को किसी वस्तु कि तरह उपयोग किया जा रहा है। फिल्मो ने तो नारी देह के प्रदर्शन में सभी को पीछे छोड़ दिया , जंहा अभिनेत्रिया आपत्तिजनक अंगप्रदर्शन और दृश्य करने के बाद यह कहकर पल्ला झाड लेती है कि फला सीन में कोई बुराई नहीं है और यह तो फिल्म कि मांग और सिचुएशन के अनुरूप है। इससे शर्मनाक स्थिति और क्या हो सकती है जब स्वयं नारी ही एक अनुचित प्रदर्शन को लेकर इस तरह का तर्क प्रस्तुत करे। " क्या कूल है हम..." "गरम - मसाला" , नो एंट्री जैसी घटिया कॉमेडी फिल्मे दर्शको के सामने परोसकर निर्माता - निर्देशक समाज को कौन सी दिशा देना चाहते है ये मेरी समझ से परे है । और उसके बाद निर्माता - निर्देशकों द्वारा यह टिपण्णी किया जाना कि ऐसी फिल्मे आज के दर्शको कि डिमांड है और यंग जेनरेशन के अनुरूप है, बहुत ही हास्यास्पद लगता है। निश्चित रूप से ये फिल्मे जो "ऐ " सर्टिफिकेट नहीं है (?) पुरे परिवार के साथ बैठकर देखी जा सकती है बशर्ते कि पूरा परिवार अलग -अलग कमरों में बैठकर फिल्मे देख रहा हो। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में नारी देह के प्रदर्शन से फैलती गन्दी मानसिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली के एक प्रतिष्ठित स्कूल की छात्रा का आपत्तिजनक एम् एम् एस किसी वायरस कि भाति लोकप्रिय (?) हो गया और इंदौर के किसी कालेज की लडकियों कि आपत्तिजनक तस्वीरे किसी "विशेष" इंटरनेट साईट पर देखी गई , जिससे लडकिया पूरी तरह अनजान थी। इस बढ़ते साईबर क्राइम का जिम्मेदार कौन है ? माना कि नारी सुन्दरता का प्रतीक है , और सुन्दर दृश्य मन को प्रफुल्लित करता है, परन्तु जब इस सौंदर्य कि सीमा लांघी जाती है, तो वही उसके बुरे स्वरुप का परिचायक बन जाता है। किसी भी देश और समाज कि उन्नति तभी संभव है , जब उस देश की, उस समाज की नारी का वंहा सम्मान हो। आज प्रिंट एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया में नारी कि भूमिका में पर्याप्त सुधार की आवश्यकता है । हमें पाश्चात्य सभ्यता एवं वातावरण का अनुकरण ना करके समाज को भारतीय संस्कृति की ओर लौटने के लिए प्रेरित करना होगा । भोगवादी प्रवृत्ति को समाप्त करके ऐसा वातावरण बनाना होगा जंहा नारी को पूर्ववत आदर एवं सम्मान मिले। आज के इस भोगवादी समाज में नारी सम्मान के अपमान कि धृष्टता करने वालो को यह बताने कि आवश्यकता है कि नारी केवल सहनशीलता और त्याग कि मूर्ती नहीं है, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर वह अपने ऊपर होने वाले अन्याय का मुहतोड़ जवाब देकर आत्मविश्वास के साथ सुखपूर्वक जीवन बिता सकती है। सबसे अहम् बात यह है कि प्रिंट एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया में नारी कि भूमिका में बदलाव लाने के लिए पहला कदम स्वयं नारियों को ही उठाना होगा तभी यह सुधारवादी आन्दोलन सफलता प्राप्त करेगा और एक स्वस्थ और सुखी समाज कि कल्पना कि जा सकती है। (यह लेख हमनें तोशी गुप्ता के ब्लॉग 'तोशी 'से साभार लिया है . ब्लॉग का पता है - http://toshigupta.blogspot.कॉम )